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व्यंग्य-टमाटर चर्चा में

आज से दो महीने पहले मिलने वाला टमाटर अचानक चर्चा में आ गया।याने चर्चा उसकी होती है जिसके भाव बड़े हो।सहज जो मिल जाये उसकी चर्चा न होगी।शायद यही कारण है कि कुछ लोग अपने भाव बढ़ाने में लगे रहते है।जानते हुए की किसी समय फुर्सत में वह सहज उपलब्ध थे। कुछ ही समय पहले की बात है।हर आता जाता व्यक्ति हाथ लगा कर उसकी क्वालिटी,उसका लाल रंग उसकी ताजगी,देसी है या विदेसी।याने हर कसौटी पर जांचने पर के बाद ,उसे हाथ से दबा कर आगे बढ़ जाता था।अब वह इनमें से कुछ भी नही कर पाता।कारण एक ही ,भाव बढ़ गए है।यानी महज भाव बढ़ जाने से रंग,रूप गुणवत्ता और ताजगी गौण हो जाते है।यही जीवन का दर्शन है।ऑफिस ,राजनीति,फ़िल्म,कला से लेकर आसपडोस,शिक्षा ,समाज,धर्म ,आद्यात्मन में यही तो हो रहा है।जिसके जितने भाव वह उतना चर्चा में।और चर्चा में बने रहना है,तो भाव बढ़ाने में लगे रहो। अब सवाल यह उठता है कि भाव बढ़ा कौन रहा है?वही जो उसकी चर्चा करता है।अब तो वह यह भी कहने लगा है कि उसके बिना कैसे रह पाएंगे।वह सरकार को कोसता है,आढ़तियों को कोसता है और दिन रात लगा है बस।हर पल उसकी कमी खलती है।कल पत्नी कह रही थी कम से कम एक टमाटर तो ले आओ उसल...

आदरणीय की कैची

  काफी दिनों से अलग अलग शहरों में रहते हुए बालो की कटिंग वही नजदीक के सैलून में करवाने के बाद अपने शहर के पुराने जाने पहचाने सैलून में कटिंग करवाने का अनुभव ही कुछ और है।काफी सालो के बाद पवन भिया के "आदरणीय सैलून" में अपने बेतरतीब बालो का मेक इन इंडिया करवाने पहुचा। पवन भिया अपने गुड गवर्नेंस के लिए लोकमान्य से बिजलपुर तक प्रसिद्ध है ।उनके सभी भाई बड़े अदब से स्वागत करते है।पवन भिया के बातों में वो जादू है कि उनके ग्राहक उनके पास ही रहते है।पवन भिया ने हालचाल पूछ कर मुझे छोटे के हवाले किया।छोटे को मैं तब से जानता हूं जब वो ट्रेनी था औऱ अब एक्सपर्ट हो गया है।देखते ही उसने बता दिया कि पूर्व के नाईयो द्वारा मेरे बालो का जो सत्यानाश हुआ है ,उसे उसकी कैची उस्तरे से ही ठीक किया जा सकता है।अगले 10 मिनट गुजर गए पीछे के बालों को काटते हुए।मैंने समय देखा तो वो बोला अच्छे सेट बाल चाहिए तो समय मत देखिए।मैंने अपने आप को मनाया।फिर छोटे बोला, पहले वाले ने बराबर बाल मिलाए नही है, इसलिए सबका  विकास बराबर नही है।फिर वो बड़े बालो को कंघी से उलीच उलीच कर छोटे करने लगा।उसकी नजरो में वो विकास की दिश...

हास्य व्यंग्य-भाई दूज, रेस्टोरेंट की वेटिंग और नेशनल जियोग्राफिक चेनल।

मेरा नेशनल जियोग्राफिक वालो से निवेदन है कि अगर वो जंगलो में हिरन शेर आदि के भोजनपनी और बर्ताव के वीडियो बनाकर पक गए हो तो थोड़ा ध्यान त्योहारों पर इंसानों  की रेस्त्रांओ पर पड़ रही भीड़ को भी कैमरे में कैद करने में लगाये।मुझे लगता है उन्हें वेटिंग करते इंसानो को देख उनके इस व्यवहार से बहुत कुछ जानने को मिलेगा। अगर ऐसी कोई डॉक्युमेंट्री शहर में बने तो वो इस प्रकार होगी।"शाम के भाईदूज के सामूहिक भोज पर बिरादरी के समूह की भोजन व्यवस्था का भार मादा पर पड़ा था।घर के मुखिया नर ने स्थिति को भांपते हुए समूह को रेस्टोरेंट में दावत दी।पर किस्मत ने साथ नही दिया।दो घण्टे तक समूह का मुखिया होटल के दरवाजे पर निगाह टिकाए रखा।वह बेचैन था कि आज रात को समूह को निराश न होना पड़े।वह बीच बीच मे हाथ बांधकर मादा को जताता है कि गुफा में ही भोजन की व्यवस्था हो जाती तो अच्छा था। एक और समूह वहाँ पहले से मौजूद था जिनका मुखिया अनुभवी बूढ़ा नर था उसे समूह की चिंता थी पर वो जवान नर मादाओं के रेस्टोरेंट प्रेम से अवगत था और उन्हें दरवाजे पर वेटिंग करते देख मंद ही मंद खुश था।  जवान नर अंदर खाना खा रहे दूसरी प्रजाति...

दूरदृष्टि

इस साल बजट से मैंने एक बात सीखी,जब पास का नजर न आये तो दूर की नजर सुधार लो।न केवल सुधार लो बल्कि ये अहसास दिला दो की दूरदृष्टि हो तो आपके जैसी।अपन ने भी यही फार्मूला अपना लिया है घर मे। पिछले हफ्ते बीवी कह रही थी कि फ्रिज और एसी बदलने का समय आ गया है।मैंने कहॉ रुक जा सरकार ग्लोबल वार्मिंग पर लपक के काम कर रही है।थोड़े समय मे फ्रिज और एसी की जरूरत ही पड़ेगी नही।यही यहाँ मुम्बई में शिमला का आनंद लेंगे।वह शिमला घूम कर आई थी तो बोली की एक बार क्यो न इंटरनेशल टूर करे?मैंने कहॉ थोड़ा सा रुक जा,सरकार हजारों किमी लंबी सड़कें डाल रही है अपन खुद की कार में विदेश यात्रा करेंगे। अभी ये सब बोल के दो ही दिन हुए थे कि बीवी बोली अपन अपना घर कब बनाएंगे?मैंने कहॉ धीरज रख पहले गरीबो के घर बन जाये फिर सरकार ने हमारे लिए ही तो घर बनाना है।क्योंकि उनके घर बनने के बाद गरीबी रहेगी ही नही फिर बस मिडिल क्लास टेक्स पेयर की ही बात होगी।अपना घर जल्द ही बन जायेगा"मिडिल क्लास टैक्सपेयर आवास योजना" के अंतर्गत। उसको भी समझ आ गया था कि मैं बड़ी बड़ी बातो का कोई न कोई तर्क दे ही दूंगा।हताश होकर बोली एक काम करो दस हज...

दिवाली के पटाखे

व्यंग्य-दिवाली के पटाखे बचपन मे हमे दिवाली मतलब  एक ही बात पता थी, पटाखे।पटाखों पर यदि उस समय सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा वैसा निर्णय लेती तो मेरा कानून व्यबस्था से विश्वास ही उठ गया होता।पटाखों की लिस्ट बनाना ये दिवाली का आगाज़ होता।यही एक काम होगा जीवन में मैंने प्लांनिग से किया।मूल लिस्ट में दुकान भर के पटाखे होते, जिसे देख मम्मी की ओर से इसमे कुछ निर्यात्मक सुझाव होते जिन्हें सोशियोइकोनॉमिक कॉज मानकर हम मान लेते।कारण सोशल स्टडीज और इकोनॉमिक्स ये पाठ मिडिल क्लास फेमेली में बच्चे के पैदा होने ही उसे मिल जाते,जो कि आजकल लाख पढ़ाने पर भी स्कुलवाले नही दे पाते।खैर मम्मी की तरफ से लिस्ट में छटाई होने के बाद हम पिताजी के साथ पटाखे खरीदने जाते। चकित नजरो से सभी दुकानों को देखने के बाद आँखे किसी सीधे टाइप दिखने वाले दुकानदार पे रुकती। पिताजी धीरे पूछते की इतने रुपये में कितने पटाखे आ जाएंगे।दुकानदार ये सुनते ही समझ जाता कि इनको क्या देना है।वो हमें मोदीजी के मन की बातो की तरह ज्यादा दिखने वाली वाली छुट्टी लड़ और चिड़िया बम टाइप चीजे दिखाता।पर हमारे मन की बात नही हो रही है ये उनके मौन संवाद से हमे...

व्यंग्य-ऑर्गेनिक का बोध

देख रहा हु ऑर्गेनिक पदार्थो का बोलबाला चरम पर है।ऑर्गेनिक का बोध वैसा है जैसे पचास  पार करते ही इंसान अध्यात्म की तरफ़ खिंचता है।उसे पूजा कर्मकांड और गीता में जीवन का सार नज़र आता है।इससे पहले वो ताउम्र शरीर और मन से जहरीले अप्राकॄत भोगविलास में संतुष्ट रहता है पर अब वो चाहता है कि उसका मन और शरीर ऑर्गेनिक हो जाये।उसे अचानक अमृतपान की ललक लग जाती है। जब इंसान के जेब मे पैसे हो और सोचने की फुर्सत तो उसकी ऑर्गेनिक के प्रति वासना जागती है।फिर वो देसी गाय के दूध से  पारम्परिक बिलोने से मथे मक्खन से बना 2500 रु किलो का घी क्यो न हो।एक समय था जब घर पर इसी बिलोने से मख्खन निकालने में दिमाग का दही हो जाता था। मॉल में जब ऑर्गेनिक के सेक्शन में पहुचता हु तो उनके पेकिंग और कंटेंट पढ़कर आत्मग्लानि से मन भर जाता है। लगता है कि मैंने अनजाने में अबतक न जाने कितने लीटर कीटनाशक पी लिया हो।और कुछ देर तो मुझे यूरिया खाद अपने शरीर मे दौड़ता हुआ महसूस होता है।और मैं बिना दाम देखे ही वह उठा लेता हूं। अभी कुछ दिनों पहले से ऑर्गेनिक शहद की वासना fb ने जगाई है।उनका दावा है कि मधुमक्खियां ही अपना शहद बोतल ...

व्यंग्य-औलाद का बिगड़ना और मीडिया कवरेज

मुझे याद है बचपन मे मेरे एक दोस्त को शौकिया सिगरेट पीने का चस्का लगा। किसी रोज 2-3 रु मिल जाए एक्स्ट्रा तो रात में कॉलोनी के पीछे के पान वाले के यहाँ जाकर आसपास देख कर घुप्प अंधेरे में कश खींचना,फिर एक रु की पिपरमेंट वाली च्विंगम खाकर कुल्ला कर के घर जाना। ये सिलसिला ज्यादा चला नही।मम्मी रूपी नारको विभाग ने दोस्त के शर्ट से कॉलर की बदबू सूंघ ली।मम्मी को शक पहले से था पर सबूत हाथ लगने की खुशी उसे पहली बार मिली थी।फिर क्या था उन्होंने पापा यानी सीबीआई को ये बात बताई।बस फिर क्या था,सीबीआई अपने काम पर।उसी रात को रंगे हाथ ही धर दबोचा उनने। रात को अंधेरे में कूटते कूटते घर ले गए।रस्ते में मीडिया यानी दो तीन बुजुर्ग अंकलों ने ये नजारा देखा जो उनके लिए दूसरे दिन का मसाला था।इधर घर आकर दोस्त ने खूब माफी मांगी पर नार्को विभाग याने मम्मी ने आग में घी डालने का ही काम किया और देर रात तक धुलाई चलती रही।रात को दोनो विभागों ने निर्णय लिया कि गलती उनकी देखरेख की ही है।और फिर थक कर सब सो गए। दूसरे दिन मिडिया वाले काका लोगो ने कवर स्टोरी कॉलोनी में पसार ही दी थी।सिगरेट पीने के साथ दूसरे आरोप भी थे।सबसे स...