हास्य व्यंग्य-भाई दूज, रेस्टोरेंट की वेटिंग और नेशनल जियोग्राफिक चेनल।
मेरा नेशनल जियोग्राफिक वालो से निवेदन है कि अगर वो जंगलो में हिरन शेर आदि के भोजनपनी और बर्ताव के वीडियो बनाकर पक गए हो तो थोड़ा ध्यान त्योहारों पर इंसानों की रेस्त्रांओ पर पड़ रही भीड़ को भी कैमरे में कैद करने में लगाये।मुझे लगता है उन्हें वेटिंग करते इंसानो को देख उनके इस व्यवहार से बहुत कुछ जानने को मिलेगा।
अगर ऐसी कोई डॉक्युमेंट्री शहर में बने तो वो इस प्रकार होगी।"शाम के भाईदूज के सामूहिक भोज पर बिरादरी के समूह की भोजन व्यवस्था का भार मादा पर पड़ा था।घर के मुखिया नर ने स्थिति को भांपते हुए समूह को रेस्टोरेंट में दावत दी।पर किस्मत ने साथ नही दिया।दो घण्टे तक समूह का मुखिया होटल के दरवाजे पर निगाह टिकाए रखा।वह बेचैन था कि आज रात को समूह को निराश न होना पड़े।वह बीच बीच मे हाथ बांधकर मादा को जताता है कि गुफा में ही भोजन की व्यवस्था हो जाती तो अच्छा था।
एक और समूह वहाँ पहले से मौजूद था जिनका मुखिया अनुभवी बूढ़ा नर था उसे समूह की चिंता थी पर वो जवान नर मादाओं के रेस्टोरेंट प्रेम से अवगत था और उन्हें दरवाजे पर वेटिंग करते देख मंद ही मंद खुश था। जवान नर अंदर खाना खा रहे दूसरी प्रजाति के समूहों को आनंद लेते देख दुखी थे कि उनका नम्बर कब आएगा?अनुभवी बूढ़े नर से जब भी उनकी नजरें टकराती तो यही कहती कि भले ही समूह की मादाओं पर उनका बस न चलता हो पर बिल पे करने की जवाबदारी जवान नरों पर ही है।
इधर बच्चो का भूख से हाल बेहाल था।त्योहार के मौसम की मार झेल रहे बच्चो की गति माँ से देखी नही गयी पर वो कर भी क्या सकती थी,गुफा में सुबह की थोड़ी खिचड़ी बाकी थी।अगर आज उन्हें निराश लौटना पड़े तो जीवन अस्तित्व पर गहराए संकट से निपटने के लिए खिचड़ी ही एकमात्र विकल्प होगा।
चैनल वाले चाहे तो इस काम के लिए मेरी सेवाएं ले सकते है।कुछ डॉक्युमेंट्री तो मैं स्वयं बना सकता हु।इन्हें बड़े टीवी पर देखने मे भी मजा तो आएगा ही और आने वाली पीढ़ियों को पता चलेगा कि श्रीमंत भारत में समूह भोज की तस्वीर क्या थी।मुझे विश्वास है कि नेशनल जियोग्राफिक वाले मुझे निराश नही करेंगे।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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