व्यंग्य-औलाद का बिगड़ना और मीडिया कवरेज


मुझे याद है बचपन मे मेरे एक दोस्त को शौकिया सिगरेट पीने का चस्का लगा। किसी रोज 2-3 रु मिल जाए एक्स्ट्रा तो रात में कॉलोनी के पीछे के पान वाले के यहाँ जाकर आसपास देख कर घुप्प अंधेरे में कश खींचना,फिर एक रु की पिपरमेंट वाली च्विंगम खाकर कुल्ला कर के घर जाना।

ये सिलसिला ज्यादा चला नही।मम्मी रूपी नारको विभाग ने दोस्त के शर्ट से कॉलर की बदबू सूंघ ली।मम्मी को शक पहले से था पर सबूत हाथ लगने की खुशी उसे पहली बार मिली थी।फिर क्या था उन्होंने पापा यानी सीबीआई को ये बात बताई।बस फिर क्या था,सीबीआई अपने काम पर।उसी रात को रंगे हाथ ही धर दबोचा उनने।

रात को अंधेरे में कूटते कूटते घर ले गए।रस्ते में मीडिया यानी दो तीन बुजुर्ग अंकलों ने ये नजारा देखा जो उनके लिए दूसरे दिन का मसाला था।इधर घर आकर दोस्त ने खूब माफी मांगी पर नार्को विभाग याने मम्मी ने आग में घी डालने का ही काम किया और देर रात तक धुलाई चलती रही।रात को दोनो विभागों ने निर्णय लिया कि गलती उनकी देखरेख की ही है।और फिर थक कर सब सो गए।

दूसरे दिन मिडिया वाले काका लोगो ने कवर स्टोरी कॉलोनी में पसार ही दी थी।सिगरेट पीने के साथ दूसरे आरोप भी थे।सबसे संगीन आरोप ये था कि वो दोस्त बुजुर्ग मीडिया (काका लोगो) को अनदेखा कर के सामने से निकल जाता था।पेशी का समय आया,दोस्त से मम्मी की कसम खिलवाई।मम्मी की कसम मतलब लाई डिटेक्टर टेस्ट था।बाद में काका लोगो के पैर छुआये और उन्होंने इमेज क्लीन करते हुए उसे आशीर्वाद दिया और अच्छा बच्चा बताया।पापा अपना काम करके पहले ही पिक्चर से बाहर हो गए थे।इस तरह जमानत का काम पूरा हुआ।

कुल मिला कर पुराना जमाना कुछ ऐसा था कि माँ बाप और कॉलोनी के लोग ही आपस मे सब निपट लेते थे।इसलिए कभी कोर्ट जेल जाने की बारी आई ही नही।सामाजिक व्यवस्थाएं कुछ इस तरह थी कि स्वछंद निजी जीवन को स्थान मिला ही नही।पर अब बाहर तो दूर  घर मे ही संवाद बंद है,यही कारण है कि बिगड़ा बच्चा पुलिस,कोर्ट,मीडिया,जमानत के रस्ते घर आता है।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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