व्यंग्य-ऑर्गेनिक का बोध


देख रहा हु ऑर्गेनिक पदार्थो का बोलबाला चरम पर है।ऑर्गेनिक का बोध वैसा है जैसे पचास  पार करते ही इंसान अध्यात्म की तरफ़ खिंचता है।उसे पूजा कर्मकांड और गीता में जीवन का सार नज़र आता है।इससे पहले वो ताउम्र शरीर और मन से जहरीले अप्राकॄत भोगविलास में संतुष्ट रहता है पर अब वो चाहता है कि उसका मन और शरीर ऑर्गेनिक हो जाये।उसे अचानक अमृतपान की ललक लग जाती है।

जब इंसान के जेब मे पैसे हो और सोचने की फुर्सत तो उसकी ऑर्गेनिक के प्रति वासना जागती है।फिर वो देसी गाय के दूध से  पारम्परिक बिलोने से मथे मक्खन से बना 2500 रु किलो का घी क्यो न हो।एक समय था जब घर पर इसी बिलोने से मख्खन निकालने में दिमाग का दही हो जाता था।

मॉल में जब ऑर्गेनिक के सेक्शन में पहुचता हु तो उनके पेकिंग और कंटेंट पढ़कर आत्मग्लानि से मन भर जाता है। लगता है कि मैंने अनजाने में अबतक न जाने कितने लीटर कीटनाशक पी लिया हो।और कुछ देर तो मुझे यूरिया खाद अपने शरीर मे दौड़ता हुआ महसूस होता है।और मैं बिना दाम देखे ही वह उठा लेता हूं।

अभी कुछ दिनों पहले से ऑर्गेनिक शहद की वासना fb ने जगाई है।उनका दावा है कि मधुमक्खियां ही अपना शहद बोतल में पैक कर के घर  भिजवाती है।यहाँ इंसान का कोई काम ही नही है।इसी तरह एक कंपनी सीधे गाय भैस से दूध निकालकर क्वालिटी का दावा कर रही है।ऐसे बहुत से स्टार्टअप है जो अपनी सच्चाई का दावा ठोकने में लगे है।वस्तुतः जैविकता सच और झूठ का अनुपात ही है।

बड़ी सीधी सी बात है जिसकी जेब मे शुद्ध सच को पचाने की औकात होगी उसे ही जीवन की सच्चाई का बोध होगा।ये बात शद्ध ऑर्गेनिक खाद्य  की हो या पचास के बाद जीवन मे आये आद्यात्म के बोध की,दोनो पर लागू होती है।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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