दिवाली के पटाखे
व्यंग्य-दिवाली के पटाखे
बचपन मे हमे दिवाली मतलब एक ही बात पता थी, पटाखे।पटाखों पर यदि उस समय सुप्रीम कोर्ट कुछ ऐसा वैसा निर्णय लेती तो मेरा कानून व्यबस्था से विश्वास ही उठ गया होता।पटाखों की लिस्ट बनाना ये दिवाली का आगाज़ होता।यही एक काम होगा जीवन में मैंने प्लांनिग से किया।मूल लिस्ट में दुकान भर के पटाखे होते, जिसे देख मम्मी की ओर से इसमे कुछ निर्यात्मक सुझाव होते जिन्हें सोशियोइकोनॉमिक कॉज मानकर हम मान लेते।कारण सोशल स्टडीज और इकोनॉमिक्स ये पाठ मिडिल क्लास फेमेली में बच्चे के पैदा होने ही उसे मिल जाते,जो कि आजकल लाख पढ़ाने पर भी स्कुलवाले नही दे पाते।खैर मम्मी की तरफ से लिस्ट में छटाई होने के बाद हम पिताजी के साथ पटाखे खरीदने जाते।
चकित नजरो से सभी दुकानों को देखने के बाद आँखे किसी सीधे टाइप दिखने वाले दुकानदार पे रुकती। पिताजी धीरे पूछते की इतने रुपये में कितने पटाखे आ जाएंगे।दुकानदार ये सुनते ही समझ जाता कि इनको क्या देना है।वो हमें मोदीजी के मन की बातो की तरह ज्यादा दिखने वाली वाली छुट्टी लड़ और चिड़िया बम टाइप चीजे दिखाता।पर हमारे मन की बात नही हो रही है ये उनके मौन संवाद से हमे समझ चुका होता।
खैर कुछ उनकी कुछ अपनी चलाने पर हमें संतोष होता।घर आकर शुरू होता था शक्ति प्रदर्शन।कौन दोस्त बजट में अपनी पसंद के कितने ज्यादा पटाखे लाया ,अक्सर यहाँ हमारी ही जीत होतीं।क्योकि दुसरो के माँ बाप हमारे वालो की तरह लीबरल नही थे।वो सम्पन्न होकर भी बच्चो की नही चलने देते।फिर मुझे लगता अच्छा ही हुआ मैं इन जैसे सम्पन्न मा बाप के यहां पैदा नही हुआ जहाँ ममी पापा की दादागिरी चलती है।मेरे पास फोड़ने के लिए रस्सी बम होते तो उनके पास चकरी अनार जैसे नाजुक पटाखे होते।मेरे पास रॉकेट होता तो उनके पास रस्सी।
लक्ष्मी पूजन होते ही बाहर पटाखे फोड़ने भागना दिवाली का कोर इवेंट होता।बस यही से हमारी मम्मी का रोल प्ले शुरू होता।हमने कभी भी डबल आवाज वाले पटाखे नही खरीदे।हमारे घर से पटाखे फुटने पर वैसे ही दो आवाजे आती।एक पटाखे की और दूसरी हमारी मम्मी की।पांच रु का अनार 10 मीटर ऊपर जाकर वायर को नही जलाएगा और बोतल से रॉकेट छूटकर पड़ोसी की खिड़की से उसके बेडरूम को नही जलाएगा ये भौतिक विज्ञान मैं उसे कभी समंझा नही पाया।
अब मैं बड़ा हो गया हूं।मेरी जगह मेरे बेटे और भतीजियों ने ले ली है।पर मेरी मम्मी यानी उनकी दादी अपना रोल प्ले बखूबी निभाती है।अब मैं सोचता हूं कि कहॉ गयी वो छोटी खुशियां जो हम अभाव में भी जमकर मनाते थे।शायद हम खुश होना भूल गए है।बचपन की इन यादों के साथ आप हँसी खुशी दिवाली मनाए।हैप्पी दिवाली फ्रेंड्स।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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