व्यंग्य-शिक्षक दिवस
आज न जाने क्यों स्कूल टीचरों पर प्रेम उमड़ पड़ा।सच तो ये है कि बचपन मे मैने टीचरों की डांट खाने के अलावा कोई भी उल्लेखनीय काम नही किया।जिन टीचरों को मैं तिरछी आँख भी नही सुहाता था उनसे मिलता हु तो न जाने क्यों अश्रुपात होने लगता है।जबकि एक समय था जब मेरी कॉपियों के सुवर्णाक्षर पढ़ते पढ़ते उनकी आखो में आंसू आ जाते थे और वो तंग आकर मुझे धक्के से पास कर दिया करते थे ।हॉ पर आजकल वही टीचर्स अब मुझे अपने घर पर पधारने का न्योता भी देते है जिनका दिया होमवर्क न करने पर अक्सर क्लास से बाहर निकाला जाता था ।
पर ऐसा क्या हो गया कि दुबारा से मेरा टीचर प्रेम इस तरह बह निकला, ये एक सायकोलॉजी के विद्यार्थी के लिए पीएचडी करने का विषय बन सकता है ।इनफैक्ट मैं स्वयं भी इसके लिए छोटा मोटा शोधपत्र तो लिख ही सकता हु।
बचपन मे स्कूल बंधन था फिर कॉलेज में एहसास हुआ स्कूल ही ठीक था।फिर नौकरी में लगे तो लगने लगा स्कूल कॉलेज ही अच्छे थे कम से कम फेल होने पर डांट ही मिलती थी, टीचर की।दूसरे दिन सब सेट हो जाता था।नौकरी में एक गलती हजार के बराबर।
इसके बावजूद भी जीवन मे कही उन्मुक्तता थी।पर स्वयं को ये रास नहीं आयी और जल्द ही हम विवाह बंधन में बंध गए।फिर तो स्कूल कॉलेज के टीचर श्रेद्धय हो गए।और आज हम बड़े भावुक होकर टीचरों के आगे नतमस्तक है और महसूस करते है कि उनकी डांट कितनी मधुर थी।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
Comments
Post a Comment