व्यंग्य-कुछ अच्छा हो जाये
इन दिनों मैं नये रोग की बात करूँगा जो किचन से आ रहा है।किचन में जाते ही लगता है कि कुछ अच्छा खाया बनाया जाए।यही कारण है कि पिछले लॉक डाउन में लोग मुँह पर कपड़ा बांध कर किराने की दुकानें खाली कर गए।कुछ लोग तो ड्राइंगरूम से ज्यादा किचन में मंडराते रहे।
लोग दुकानो पर इसेन्स बेकिंग पाउडर इस तरह ले रहे थे मानो अगले जनम के बर्थडे भी इसी जनम में बना लेंगे।पेट्रोल पंप पर तेल का उतना स्टॉक नही जितना मेरे पड़ोसी ने सिंगदाने के तेल का भर के रखा था।मैदा,रवा और बेसन तो मानो जीवनोपयोगी हो गया,ये तीन नही तो घरवाले जीने नही देंगे वाली स्थिति थी।पकौड़े के साथ हरि मिर्च की चटनी बनाने के लिए लोग पड़ोसी के घर पर लगी मिर्ची चुराने से भी न चुके।तलब जगाने वाली चीजो में शराब के बाद पानी पूरी को दूसरा स्थान मिला।लोग पानी पूरी के पतासे ब्लेक में खरीदते नजर आए।
एक तरफ फ्रिज अपने से चार गुना कैपिसिटी से कम कर रहा था वही लोग पाककला के नए नए आयाम छू रहे थे।मेरी एक दोस्त तो अलग ही लेवल पर थी।दूध फाड़ कर छैने से रसगुल्ले बनाने तक तो बात ठीक थी पर एक दिन तो उसने घर पर ब्रेड और पाव भी बना दिए ।और तो और उसे एक दिन पाचक गटागट खाने की तलब लगी तो वो भी उसने घर पर बना ली।मुझे पूरा विश्वास हो गया कि कोरोना से मंदी आये न आये पर घर पर ऐसी अफलातून चीजो का उत्पादन करके ये देश मे मंदी जरूर लेकर आएगी।
खाने के प्रति ऐसे अगाध प्रेम को हमने इस लॉक डाउन में जाना।लोगो को समझ आया कि जीवन साथी सुंदर हो न हो पर उसे अच्छा खाना बनाना आना चाहिए।जो लोग शादी करते वक्त इस फीचर को भूल गए थे उन्हें बहुत समस्याएं हुई।सारे होटल बंद थे।पड़ोसन के खाने की तारीफ करने पर भी वहां से कुछ मिलना नही था।ऊपर से व्हाट्स एप पर दिग्गज रिश्तेदार व्यंजनों की रमी खेल रहे थे।रोज एक से बढ़कर एक पत्ते फेंक रहे थे,असल मे वो पाककला नही बता रहे थे बल्कि जता रहे थे कि मेरी अरेंज मैरिज तेरी लव मैरेज से सफल कैसे?
जिंदगी बदल गयी लोगों की, लोग होटलों को भूल गए।मुझे लगता है जब होटल शुरू होंगे तो लोग वहां भी किचन में घुस घुस कर सलाह न देने लगे??बिल पेमेंट करते वक्त उनकी आखों में आंसू होंगे ये बात तो तय है।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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