दक्षता की ओर
कोई काम छोटा नही होता और बर्तन धोना तो बिल्कुल भी नही। सरकार ने बर्तन धोने के कार्य को विशेष दक्षता के रूप में देखना चाहिए।मैं तो अब देखने लगा हु।होम क्वारंटाइन का चौथा है आज।पहले दिन ही ढेर कपड़े और झाड़ू पोछा कर चुकी पत्नी की आँखों मे फेसबुक व्हाट्सएप टॉपते पति के प्रति क्या इज्जत होती है उसका एहसास हो चला था।इसलिए बर्तन की ड्यूटी स्वेच्छा से ली मैंने।
पहले दिन उत्साह था और बर्तन भी कम थे।दूसरे दिन मुझे समझ आया कि हमारे घर मे कितने बर्तन है।और तीसरे दिन अहसास हुआ कि तीन लोगों के लिए इतने बर्तन चाहिए क्या?फिलहाल मुझे दिख रहा था कि पच्चीस चमचे धोने में पड़े है इसलिए बेटे की तरीके से पड़ताल हुई।जाँच में च्यवनप्राश और फ्रिज में पडा श्रीखण्ड इसके लिए दोषी पाया गया।जैसे जैसे छोटी बड़ी थालिया हाथ आ रहीं थी वैसे वैसे मन ही मन गालियां भी।सुबह जिस तरह आराम से नाश्ते का ऑर्डर देता था मुझे लग रहा है की बढ़ते हुए बर्तनों के संख्या देखते हुए मोदीजी को बोलकर कुछ सप्ताह के लिए नास्ता बंद करवाना पड़ेगा।वैसे भी घर बैठे बैठे इतना खाकर मोटे थोड़े ना होना है।ये लॉजिक देना घरवालो को शायद ठीक रहेगा।
बर्तन धोते वक्त कम पानी और साबुन का इस्तेमाल मुझ प्रशिक्षु पर लागू नही होता था, पर चार दिन बाद मुझे इसका अहसास दिलाया गया। कम तेल घी खाना स्वास्थ्य के लिए कितना लाभदायक है वो मुझे कढ़ाही मांजते हुए समझ आया।जैसे जैसे बर्तन धुल कर कम हो रहे थे मुझे लग रहा था मानो मैं जंग जीतने के बिल्कुल कगार पर हु।तभी दूध का तपेला वैश्विक आपदा की तरह सामने खड़ा हो गया। ठीक कोरोना वाइरस की तरह,चीकट और बेशरम।स्मार्ट चीनियों की तरह फटाफट ओटला और हाथ साफ करने के साथ काम खत्म किया।पीछे बर्तन जमाने पर कोई मुझसे चर्चा नही करेगा,यह मैं पहले ही जाहिर कर चुका था।
पर एक बात साफ हो गयी कि काम कोई भी छोटा नही होता।बॉस बनकर सेलरी दे देने भर से काम आसान नही हो जाते।काम को आसान करते है वो हाथ,जो दक्ष है।उन हाथों का सम्मान सीखा गया ये कोरोना।आज वक्त आ गया उन दक्ष हाथो के अहसान चुकाने का।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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