प्रोपर्टी ओनर


जिस सोसायटी मैं किराये के मकान में रहता था वहीं साहब का खुद का मकान था।बड़े शहर में मकान बनाना निश्चित ही उनकी उपलब्धि थी।

अलग ही टशन में रहते वो।मेरे किराये के मकान में रहने से उन्हें लगता था कि मेरी जिंदगी बेकार चली गयी।मैं उन्हें नमस्कार करता तो उनकी नजरे आँखों ही आँखों मे मुझे ये बात समझा देती।

अभी कुछ दिन पहले घरबार छोड़कर उन्हें जाना पड़ा।मैं भी गया था उन्हें छोड़ने।एक अनजान वीरान जगह पर लकड़ी के ढेर में उन्हें लिटाया।बस एक घण्टे का खेल और बच गयी मुट्टी भर राख।उनकी आत्मा किराये का शरीर छोड़ गई थी।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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