व्यंग्य-सुई पुराण


इंजेक्शन का खौफ क्या होता है उनसे पूछो जिनको बचपन मे चार लोग पकड़ के रखते थे,तब जाकर सुई लगती और आधी कॉलोनी को पता लगता था कि फलाने की औलाद आज डॉक्टर के हाथ लगी है।बहुत से तो उन यादों से कभी उबरे ही नही और अबतक किसी तरह सुई से यह कह कर बचते रहे कि "डॉक्टर साहब गोलियां ही दे दो" पर कभी सुई लगने नही दी शरीर को।

बचपन मे कुछ माँ बाप,बच्चे को टॉफी  लॉलीपॉप का लालच देकर सफलता पूर्वक टिके लगवा लाये और मच्छर काटा ऐसी भावना जता कर बच्चे को हसाँ भी लाये।ऐसे सफल बच्चो को बड़े होने पर  आज भी बहुत मजा आता जब वो किसी को सुई लगते हुए रोते बिलखते देखते है।आपको सेंटर तक ले जाने वाले मित्र,रिस्तेदारो सलाहकारों में ज्यादातर वही है जिन्होंने बचपन मे ही ये सफलता अर्जित कर ली थी।

उन पतियों की तो लॉटरी निकल गयी जिनकी बीवियाँ केवल इंजेक्शन से डरती है बाकी दवाई समेत वो सबको घोल के पी चुकी है।ऐसे खुराफाती पति रोज अपनी पत्नी को उसके वैक्सीन लगने के दिन नजदीक आ रहे बता कर सुख प्राप्त कर रहे है।उसपर भी वो ये बताने से नही चूकते की 28 दिन के अंतर पर दो लगेंगे।

खैर ये सब मजाक मस्ती है।जान बचाना है तो सुई तो लगेगी।अब कोई खुद होकर सेंटर पर बहादुरी के फोटो खिंचाये या फिर कोई परोपकारी व्यक्ति उसे जबरदस्ती सेंटर ले जाये।और हॉ यदि आपको भी दूसरों को सुई लगते देख आनंद की अनुभूति होती हो तो इसे अवश्य शेयर करे।सुई लगना पक्का है भिया।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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