व्यंग्य-जूतें का असमय टूटना


वो नामी पुरानी दुकान है।उनके जूतें अच्छे चलते है।अच्छे जुतों के साथ उनका व्यवहार अच्छा है।इनसे जूतें पाकर इंसान सेटिस्फाई होता है,बार बार आता है।पर इस बार हमें समय से पहले इनके पास आना पड़ा।

पिछले साल लोकडाउन में खरीदे जुतें,जिन्हें कभी  पहना भी नही।पहली बार ऑफिस जाने के लिए पहने और ऑफिस पहुचने तक सोल टुकड़े टुकड़े हो गया।पसंदीदा ब्रांड का महंगा जूता समय से पहले टूट जाना मतलब लव मैरिज का तलाक के केस में तब्दील हों जाने जैसा है।जिनके साथ बीतती है वो समझ सकते है।हालांकि आजकल रिश्तों से ज्यादा जूतों के टिकाऊ होने की संभावना ज्यादा है।फिर भी दुकान रूपी कोर्ट में  रोआसी  शकल बना कर फरियाद करना तो बनता है।

मैंने कहॉ भइया मैंने तो जूते पहने भी नही लॉक डाउन में फिर भी टूट गए।वो बोला लॉकडाउन में घर मे पड़े पड़े अच्छे भले इंसान टूट गए।ये तो साहब जूते है।वो बात बदलने में कोई कम नही था।अगर जूते की दुकान में काम न कर रहा होता तो जरूर नेता होता।

उसने तुरंत ऊपर बैठे नौकर को आदेश दिया।साहब को नया स्टॉक दिखा।नौकर तुरंत नीचे जूते फेंकता है।भइया बताते है कि ये 3-4 साल तक सर्विस देगा आराम से और मैं भी अपना पैर जूते में डालते हुए मान लेता हूं,क्योकि जूता हो या इंसान बिना चले पता नही चलता??

उज्ज्वल जोशी

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