व्यंग्य-शमशान का रिव्यु
ये गूगल हमें आजादी से कही जाने भी नही देता।जहां जाओ वहाँ से लौटते ही पूछता है,जगह का रिव्यू बताओ।कल मैं एक बुजुर्ग की अंत्येष्टि में गया था।लौटते वक्त नोटिफिकेशन आया "शमशान का रिव्यू बताओ और स्टार रेटिंग दो।
मुझे सुझा नही तो सोचा पहले दुसरो के रिव्यू पढ़ लेता हूं।पहला रिव्यू था "नाइस प्लेस नियर बाय माय होम, पैदल चल कर भी आ सकते है।"अब ये खुद के पैदल चलने के बात कर रहा है या मुर्दे की पता नही।दूसरा रिव्यू देखा तो लिखा था,मेन मार्केट से बहुत अंदर है।चाय नाश्ते की दुकान पास नही है,क्रियाकर्म में देर हो जाये तो बहुत बाहर आना पड़ता है।मुझे लगा गूगल इसे पढ़ते ही चाय पोहे समोसे की दुकान श्मशान में ही खुलवा देगा।
तीसरे भाई की शिकायत थी कि सिगरेट की दुकान पास नही है।तो एक की शिकायत थी कि श्मशान में मोबाइल नेटवर्क नहीं है आता।एक ने जरूर खुश होकर 5 स्टार दिए थे उसकी 100 साल की दादी की क्रिया यही की थी।वो इतना खुश इसलिए था कि बीमार दादी न जाती तो उनकी सेवा मे तो उसकी खुद की पत्नी बूढ़ी होकर मर जाती।उसने रिव्यू में लिखा था "हाइली रिकमन्डेड प्लेस।"
कोई लकड़ी गीली होने की शिकायत कर रहा था तो किसी को पंडित के मंत्र बराबर नही समझ आये।तभी स्क्रीन पर एक मोबाइल एड आया जिसमे गूगल ने बताया कि एक नया मोबाइल एप आया है जो आपकी सभी समस्या दूर करेगा।पंडित से लेकर लकड़ी तक और मटकी से लेकर अर्थी तक सब उनके एक्सपर्ट करेंगे।यहां तक कि आप कफ़न दफन कर के घर आओगे तो मृतात्मा की तस्वीर हार फूल के साथ घर मे लगी पाओगे।
श्मशान जहाँ इंसान अपनो का कंधा खोजता है,अब ये काम भी हमसे छीन जाएगा।मुझे लगा था श्मशान ये अंतिम इच्छा का छोर होगा,पर अब रिव्यू पढ़कर अब लगता है कि यहाँ भी इच्छाओं की अनंत संभावनाएं है।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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