चश्मा पुराण
चश्मा पुराण
अभी कुछ दिनों से अपनी भी नजर धुंधली हो रही थी वरना किसी समय हम इतरा के दवाई के पत्ते के कंटेंट भी पढ़ लिया करते थे।फाइनली अब चश्मे की दुकान पर दस्तक देने का समय आ ही गया।दुकान पर कदम रखते ही दुकानदार के चेहरे की मुस्कुराहट बता रही थी कि वो मुझे खाली आँख नही जाने देगा।उसने वकील की तरह फिजूल के कुछ सवाल पूछे और जजनुमा मशीन के सामने बिठा दिया।मेरी आँखे कोशिश कर रही थी की उसमे दोष सिद्ध न हो,पर जज मशीन ने अपना फैसला सुना दिया।मेरी दूर और पास दोनों नजरो में दोष सिद्ध हुआ।
मेरे केस का निराकरण पेंडिंग था और दुकानदार एक 20 साल के लड़के का चश्मा निकाल रहा था।मुझे उसे देख खुशी हुई और गर्व भी क्योकि मेरी आँखें उससे 20 साल ज्यादा साथ दे चुकी थी।दुसरो की विफलता में अपनी सफलता ढूंढना शायद यही मानव स्वभाव है।उसका बिल बनते ही अब मेरे कटने की बारी थी।मैंने उससे कहा कि नम्बर कुछ भी हो फ्रेम सिलेक्ट करने के लिए मैं अपनी पत्नी से सलाह लेना चाहता हु।वो इसलिए कि उसे विश्वास है कि मेरी चॉइस अच्छी नही है।मैं किस फ्रेम में उसके साथ सूट करूँगा ये निर्णय वही ले तो अच्छा है।मुझे पहली बार अहसास हुआ कि चश्मे के नम्बर से ज्यादा महत्व फ्रेम का है क्योकि चश्मे का नम्बर निकलने में 2 मिनट लगे और फ्रेम सिलेक्ट करने में दो घण्टे।उस समय कबीरदास जी का दोहा"मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान"पूरी तरह फेल हो गया।
पत्नी ने फ्रेम पास करते ही दूसरे दिन चश्मा बन कर आ गया था।चश्मा लगा कर मेरी दोनों नजरे दुरुस्त हो गयी थी और साथ ही तीसरी नजर डेवलप हो गयी थी।वो थी अनुभवी होने की।मुझे लग रहा था कि लोग अब मेरी बातों पर ज्यादा ध्यान देने लगे थे।मैं भी चश्मा चढ़ा कर और बीच बीच मे जब निकालकर बात करता हु तो लगता है सामने वाला मेरी बात को सीरियसली ले रहा है।मुझे लगा मानो दिव्य दृष्टि जागृत हो गयी हो।
चश्मा मुझे लगा था पर अब ऑफिस की लड़कियों का दृष्टिकोण मेरे प्रति बदल गया था।मुझे भी अब अंकल वाली फीलिंग आ रही थी।मेरी माँ और पत्नी इसका सारा श्रेय फेसबुक और व्हाट्सएप को दे रही है और रह रह कर मोबाइल पर बिताये समय पर मुझे ताना दे रही है।बहरहाल अब मैं नई दृष्टि के साथ सोशल मीडिया पर फिर हाजिर हु और लेखन जारी है।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
Comments
Post a Comment