धुंए का दर्शन शास्त्र



कल रात मैं पान की दुकान पर पान बंधवा रहा था।8 बजे का समय भीड़ ज्यादा थी।समय लगा पर बहुत कुछ जानने को मिला।ऐसा लगा मानो  ये दुकान दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान को एक दिशा प्रदान कर सकती है।मुन्ना भाई के 'सब्जेक्ट' की तरह रोज सैकड़ो 'सब्जेक्ट' यहाँ मत्था टेकने आते है बस उनको देख कर संश्लेषण करना है ।

पान की दुकान हमेशा आम दुकानों से अलग ही होती है।सिगरेट और गुटखा पाउच की लड़ियों से सजी दुकान जो सतत किवाम मसालो से महकती है।पूरीबाह की बनियान में पान वाले भैया जो अपने टूटे लाल दाँतो से अपने पान की ब्रांडिंग कर रहे होते है।मार्लबोरो के पैकेट की सजावट और उसपर मुह के कैंसर को दिखाता चित्र आकर्षण का केंद्र होता है।मजे की बात है  यहाँ भैया को मार्केटिंग, पब्लिक रिलेशन और इन्फर्मेशन जुगाड़ने की कवायद नही करनी पड़ती।भैया का मुस्कुराना होता है कि सब्जेक्ट खुद बिछ जाता है।

आज हम पान की दुकान पर सिगरेट के शौकीनों की बात करेंगे।जंगल मे पानी के लिए प्राणी जिस कदर निकलते है वैसे ही रात 8-11 के दौरान भिन्न भिन्न प्राणी यहाँ भैया की दुकान पर आते है।ठीक घड़ी से काँटा मिला कर आने वालों से लेकर शटरबंदी के वक्त हाथ जोड़ने वालो तक।उर्दू  के तलब शब्द का डेमो देखना है तो यहाँ देख सकते है।मुक्तहस्त से बटुआ निकालने वालो से लेकर खाते में लिख लो कहने वालों की लंबी श्रृंखला।बापके पैसों पर कॉलेज में जस्ट एडमिशन लिए लौंडे,डिग्री प्राप्त बेरोजगार,घिसने वाले स्त्रगलर, कॉरपोरेट में जगह बना चुके घाघ,लोन वसूली वाले,परफेक्ट सेल्समेन,बूढ़े रिटायर्ड अंकल सब आते है यहाँ।कभी कभी कुछ फेमिनिस्ट टाइप की लड़कियां भी आजकल देखी जा सकती है।

दुकान पर पहुचते ही सिर्फ ब्रांड और क्वांटिटी बोली जाती है,तब आप सब्जेक्ट की अधीरता साफ देख सकते हो।उसके लिए ये  पल युग के बराबर होते है जबतक भैया पैकेट से हाथ मे न धर दे।हाथ मे आते ही बिद्युत गति से लाइटर झपटता सब्जेक्ट पहला कश लेता है।बस यही पल है सबजेक्ट को स्टडी करने का।वो संसार की तमाम चीजे भूल चुका होता है।अब वह एक अवधूत सा,समाधि अवस्था प्राप्त निर्विचार प्राणी होता है।निराकार,निर्विकार,भावहीन अलमस्त मौजी जो अब दुनिया से कट चुका होता है।तब तक रोज के सत्संगी भी जुटने लगते है।इस क्षणिक समाधि अवस्था से उतर कर फिर  वो किसी भी सांसारिक विषय पर आराम से बात करता है।

एक बात गौर करने की है कि सब्जेक्ट मौत से नही डरता।पैकेट पर लिखा है "स्मोकिंग किल्स" और बड़े अक्षरों में चेतावनी और सड़े मुहवाली केंसर छाप फ़ोटो देखकर भी उसे भरोसा होता है कि उसके साथ ऐसा नही होगा।पर सब्जेक्ट का ये निर्भय रूप तात्कालिक होता है।सिगरेट बुझते ही वो आत्मग्लानि महसूस करता है और उससे चेतावनी याद आती है।यही कारण है कि वो स्टॉकिंग नही करता और रोज रिटेल में ही डील करता है।

जो वास्तव असली निर्भय होते है वो चेन स्मोकर होते है वो स्टॉक करते है।पानवाले भैया उनके आगमन पर इन टटपूंजीये दैनिक तलबगारों को बाजू कर देते है और उनका स्वागत करते है।वो इन प्राणियों में असली शेर होते है।वो हफ्ते में एक ही बार आते है औऱ केश में स्टॉक ले जाते है।वो बाक़ी प्राणियो के साथ वार्ता में शरीक नही होते।वो गंभीर होते है।बस कभीकभार व्यवहारिकता  दिखाने हाथ उठाते है और चल देते है।

सब्जेक्ट लंबा है गंभीर है इसलिये आज के लिए इतना ही।अभी बहुत कुछ है जानने के लिए पान की दुकान से।पेज पर बने रहिये।रचना अच्छी लगे तो कमेंट करे।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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