गुलाब की पंखुड़ियां
व्यंग्य-गुलाब की पंखुड़ी
एक समय था जब प्रेमी अपनी प्रेमिका को गुलाब देकर रिझाता।घर पर नई गाड़ी आने पर उसपर फूलों के हार लगाए जाते।घर पर पूजा होने पर द्वार पर पुष्पहार लगाए जाते।किसी का चौक पर सम्मान करना हो तो पुष्पहार गले मे डाले जाते।सही बोलू तो सदियों से हम फूलों को खुशियों के रूप में ही देखते रहे है।
पर अब वो बात नही रही।कोरोना ने लोगो के दिमाग मे ऐसा घर कर डाला है कि फूलों के मायने बदल गए।अभी हाल ही में मेरे एक मित्र ने गाड़ी खरीदी।उसने घर के बाहर गाड़ी पर फूल आदि चढ़ाए।कुछ फूल उसके घर के आसपास बिखर गए।दूसरे दिन आसपास के लोग मेरे मित्र से पूछने लगे कि घर मे पिताजी ठीक तो है न।
कुछ लोग जो "लिफाफा देखकर ख़त का मजमून भाप लेते है इन दिनों हाइपर एक्टिव हो गए है।कॉलोनी के एक परिवार में बुजुर्ग रिटायरमेन्ट लेकर घर आए।उनको उनके विभाग वालो ने भर भर कर हार पहनाए।शाम को वो सारे हार भी गाड़ी में भरकर घर ले आये।दूसरे दिन दादा देर से उठे।तबतक उनके नातियों ने उन हारो से फूल निकाल निकालकर पर आंगन में फैला दिए।वहीं पास से लिफाफा बाँचने वाले एक नमूने का गुजरना हुआ।उसने समझ लिया कि दादा की फाइल निपट गयी।माहौल ऐसा चल रहा है कि बात आग की तरह मोहल्ले भर में फैल गयी।पर मजाल है कोई डर के मारे अगले के घर आ जाये,कोई तो कह रहा था कि दादा को सुबह ही ले गए।दादा जब शाम को घूमने निकले तो लोग उन्हें पुनर्जन्म की बधाई दे रहे थे।
तो भाइयो फूलों को तरीके से इस्तेमाल करो।खास तौर पर गुलाब की पंखुड़ियों को अपने घर के आसपास न गिरने दो।वरना अफवाह बनने में आजकल वक्त नही लगता।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
नोट-यह एक व्यंग्य है किसी की भावनाएं आहत करने का उद्देश्य नही है।पर ये दोनों किस्से सत्य घटना पर आधारित है।
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