पाव और मिडिलक्लास टैक्सपेयर
पाव की महिमा
मुम्बई देश की आर्थिक राजधानी जहाँ जिंदगी कभी नही थमती।यहाँ आम आदमी दौड़ता है और समय मिल जाये तो जीने के लिए खाता है।हमारे इंदौर की तरह नही जहाँ लोग खाने के लिए जीते है।अगर मुम्बई की ही बात करे तो मायानगरी में भूख मिटाने का एक बहतरीन जुगाड़ है वो है" वड़ा पाव"।शायद इसलिए इसे कभी व्यंजन का स्थान नही मिला।पर है बड़ी कमाल की चीज।रोज करोड़ो की बिकते है यहाँ वडा पाव।
खैर इस लेख का मकसद ध्यान केंद्रीत करना है एक सादे सीधे सरल दिखने वाले 'पाव' पर जिसे कभी खास जगह नही मिली।महिमा हमेशा खास याने वड़े की ही गाई जाती है।हालांकि वड़े को भी पता है कि पाव के बिना वो चलेगा नही।सच कहें तो पाव की कोई पहचान नही कोई ब्रान्ड नही कोई लेबल नही कोई जात नही,यहॉ तक कि किसी को ये भी मतलब नही की वो कहॉ बना,कैसे चल के आया।बस आया और खप गया।
पर पाव की एक क्वालिटी है वो ये की वो हर किसी के साथ मैनेज कर लेता है।समोसा हो या अंडा या फिर हो भजिया वो हर चीज में फिट हो जाता है।शायद यही करना है कि पाव को कभी भी अस्तित्व का संघर्ष नही करना पड़ा,वो अपनी जगह बना ही लेता है।पर वड़े के साथ प्रॉब्लम है उसे सतत मार्केट में रहने के लिए रूप बदलने पड़ते है।कभी चीज़ के साथ,तो कभी कॉर्न कभी पालक तो कभी पनीर का रूप धरना पड़ता है।कभी इस कलर में तो कभी उस कलर में।अगर हम कहे कि पाव रियल सेकुलर है और वड़ा कम्युनल तो अतिशयोक्ति नही होगी।वड़े को कम्युनल रहना जरूरी है क्योंकि उसे ध्यान खींचना है।ध्यान खींचेगा तभी तो कुछ पायेगा।पाव को क्या करना है वो खुश है क्योंकि वो सिर्फ खपने के लिए बना है।
सच कहूं तो पाव में मुझे अपनी ही छवि दिखाई देती है।एक जनरल ,सहिष्णु,सरल,सेकुलर,इनकमटैक्स पेयर की, जो बना है देश की जरूरत को पूरा करने के लिए।वो बना है एडजस्ट करने के लिए,जो बना है खपने के लिए।ठीक पाव की तरह मुझपर भी कभी किसी पार्टी की नजर नही जाती।मेरे कर्जमाफी पर कोई नही सोचता।मुझे कोई रिझाने की कोशिश नही करता।पर मैं हु इसलिए देश चल रहा है।
दुकान पर वड़ा पाव हाथ मे रखते ही पाव के प्रति जो सम्मान दिखा की सच मे आँखे भर आई।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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