जंगल सफारी



अभी हाल ही में कंपनी ने टाइगर रिजर्व में जंगल सफारी का आयोजन किया।दोपहर का वक्त,हम 5-5  लोग के ग्रुप में खुली जीप में जंगल सफारी के लिए हंसी हंसी में चढ़ गए।इससे पहले मैं कभी जंगल नही गया था।हमारी शौर्य की परीक्षा होनी थी या फिर कुछ और ये HR के लिए शोध का विषय हो सकता है।जंगल में जाने का ये हममे से बहुतों का पहला अनुभवः होगा इसलिए हमें पता नही था कि बैरियर पर  आई डी कार्ड क्यो जमा करवाते है।ये हमे बाद में समझ आया।

अभी 8-9 किमी ही चले होंगे कि एक बड़ा शेर जीप के ठीक बगल से आता दिखाई दिया।जीप वही रोक दी गयी।हमारी गाइड एक लड़की थी जिसने हमे बताया कि वो दस महीने का शावक है।साले इंसानों के बच्चे दस महीने में माँ से चिपटे हुए मम्मा पापा भी नही बोल पाते और इधर इस शेर के साइज को देख के मुझे अपनी मम्मी याद आ रही थी।वो शेर हमारी ही ओर बढ़ रहा था।उसके लिए हम जैसे बेवकूफों को देखना रोज की बात थी पर मेरे लिए जवानी में मौत देखने
का पहला अनुभव था।देखते देखते मेरे पीछे भी जीप लग गयी।आगे गयी एक जीप भी पीछे रिवर्स आ गयी।और अब हम शेर के सामने थे।वो पास आ रहा था पर एक दूरी पर आकर रुक गया।

सामने की जीप में एक नवविवाहित जोड़ा फोटोग्राफी कर रहा था।उनको देख शेर का मूड बदला तो वो उनकी तरफ चला गया।मैंने राहत की सांस ली।उस जोड़े को देख बॉबी फ़िल्म के मशहूर गीत की दो लाइन याद आ गयी।जिसमे हीरो कहता है"हम तुम एक जंगल से गुजरे और शेर आ जाये" हीरोइन कहती है"शेर से मैं कहु तुमको छोड़ दे और मुझे खा जाए"।मुझे समझ नही आ रहा था कि पुराने जमाने के गाने लिखने वाले ने या तो कभी खुले में शेर को देखा नही था या फिर 30-35 साल पहले प्रेमी प्रेमिका का प्रेम इतने उच्च दर्जे का होता होगा।पर मुझे अच्छे से समझ आ गया था कि मौत को सामने देख कर सामने वाले जोड़े के मन मे ठीक इसके विपरीत ख्याल आ रहे थे।जो उनके चेहरे से साफ दिख भी रहे थे।

मेरी जीप के ड्राइवर ने कांच चढ़ा लिया था।शायद वो सोच रहा था कि पैसे देकर मौत से खेलने ये लोग आए है,मैं क्यो खामखा पेट पालने के चक्कर मे मरु।मेरे पीछे वाला सोच रहा था कि वो सही पोज़िशन में है शेर चाहेगा तो भी मुझे ही पहले निपटाएंगा, इसलिए वो वीडियो लेने में अब भी मस्त था।पीछे की जीप वाले शेर को बराबर से नही देख पाने पर दुःखी थे और हम शेर को देख देख कर दुखी हो रहे थे।पर आवाज किसी की भी नही निकल रही थी।जो भी चल रहा था मन ही मन चल रहा था।

कुछ देर शेर आगे पीछे होता रहा।इस बीच उसकी मम्मी या भाई बहन नही आये ये हमारी किस्मत थी।थोड़ी देर हमारे मजे लेने के बाद वो जंगल की ओर चला गया।वो भी शायद उत्सुक था अपनी मम्मी डैडी को आज का किस्सा बताने को और अब हम भी अब उत्सुक थे फेसबुक पर फोटो अपलोड करने को।शाम ढल गयी थी और मौत का डर भी टल गया था।

पर दो चीज जो समझ आई ।एक ये की मौत जब सामने हो तो दिलेर इंसान भी खुदगर्ज हो जाता है।और दूसरा ये की जिंदगी से डर कर रोज रोज मरने वाले एकबार सामने मौत देख ले तो जिंदगी खूबसूरत नजर आने लगती है।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

Comments

Popular posts from this blog

आदरणीय की कैची

दूरदृष्टि

व्यंग्य-ऑर्गेनिक का बोध