जब समय आएगा



सुबह ट्रेन से मुम्बई की ओर लौट रहा था।बगल की सीट पर एक हमउम्र दंपत्ति अपने 8 साल के बच्चे के साथ ट्रेवल कर रहे थे।पिता अपने बेटे को अपने हाथ से खिला रहे थे।खिलाते वक्त उन्होंने बेटे से पूछा " बड़े होने के बाद समय आने पर हमे ऐसे ही खिलायेगा या नही??"बेटा इस प्रश्न पर पिता की आखों में देख कुछ सोचने लगा।

क्या सोच रहा होगा वो??शायद ये की उसके पिता ने उसे सँभालने के बदले में शर्त रखी है।या फिर ये कोई वस्तुनिष्ठ प्रश्न है जिसमे उसने हॉ या ना को चुनने की आजादी है।पिता के लिए ये सवाल पूछने में बड़ा आसान था पर बच्चे के लिए बहुत मुश्किल।

बच्चा  बड़ा हो रहा है,देख रहा है कि उसके पिता नौकरी के सिलसिले में अपने शहर से दूर रहते है। उसके दादा दादी अकेले दूर अपने शहर में एकांत वास कर रहै है।वो अपने जिंदगी में खुश है और बहुत ही खास मौके पर साल भर में चंद दिनों के लिए अपने बच्चो से मिलने आते है।पिता भी कभी कभी अपने मातापिता से मिलने चले जाते है।शायद अभी साथ रहने का समय नही आया है।

पिता द्वारा अपने बेटे से किया हुआ ये सवाल समाज की इस वर्तमान  व्यवस्था को चित्रित करता है  जहाँ परिवार में साथ रहने के लिए समय आने का इंतजार करना होता है।संयुक्त कुटुंब की परंपरा वाले हमारे भारत देश मे  ये अर्थशास्त्र के भौगोलिकरण से उपजा  एक नया सोशल साइंस है।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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