रिश्तों की वैक्सीन ट्रायल



कोरोना के वैक्सीन का ट्रायल कितना सफल हुआ ये पता नही पर कोरोना के  हड़कंप ने घरेलू रिश्तों के सफलतापूर्वक इलाज में वैक्सीन का काम किया। खासतौर पर वो जो दूसरे शहर में काम कर रहे थे और वर्क फ्रॉम होम के चलते अब अपने पैतृक घर आ गए।यहाँ रिश्ते निभने के जो ट्रायल अब तक हुए है उनके रुझान आने शुरू हो गए है।बहुत से घरो में महीनों के ट्रायल भी हो गए है और छोटी मोटी खराश के अतिरिक्त कोई बड़ा सिम्पटम नही दिखा है।और सबसे अच्छी बात ये है कि साथ रहते हुए भी  रिश्तों की डेथ रेट ना के बराबर है।


कुछ रिश्ते बड़े काम्प्लेक्स होते है,उनमे सास बहू का रिश्ता ऐसा ही है।कुछ परिवारों में मन से आइसोलेट हों जाने के बाद इलाज न होने के चलते लगभग वेंटिलेटर पर जा चुका ये रिश्ता अब धीरे धीरे साँस भरने लगा है। अब भी ये गहन निरीक्षण में है।कभी कभी घर के काम को लेकर दांत किटकिटाते है पर रूटीन दवाओं से घण्टे दो घण्टे में नॉर्मल भी हो जाता है।


ऐसे ही देरानी जेठानी का रिश्ता भी अब उन संधियों का पालन कर रहा है जो कागज पर लिखी तो नही गयी पर मान जरूर ली है।कहीं बाप बेटे के बीच की मौन की दीवार टूट रही है तो कहि ननद भोजाई बहनों की तरह रहने लगी है।अकेले आइसोलेट रह कर चिड़चिड़े हो चुके दादा अब पोते पोतियों से शाम को खेलने लगे है।दादी अब रात को पत्तो की बिसात जमाती है और दस बजे अंधेरे में जाने वाला घर अब देर रात तक जगमगाता है।


परिवार न्यूक्लियर नही होते, बल्कि न्यूक्लियर तो केवल बम होता है ये लोगो ने अकेलेपन में  जान लिया है।कब तक ये धारणा टिकेगी पता नही?पर लोग अपने वर्तमान को निभाना सीख रहे है।शायद ये उस कुदरती वैक्सीन का असर है जो अब भी टूटे हुए रिश्तों में प्राण फूंकने का काम कर रहा है।


उज्ज्वल जोशी की कलम से

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