व्यंग्य-इंदौर का पोहा जलेबी प्रेम


इंदौर में संडे कर्फ्यू क्या खुला की पोहे जलेबी की दुकान पर छापे पड़ गए लोगो के।उतनी भीड़ पहले या तो अस्पताल के बाहर बेड के लिए थी या  फिर रेमडिसिवर इंजेक्शन के लिए थी।

आदमी लोग स्कूटी पे थैली टांग कर ऐसे भाग रहे है जैसे घरवाली ने इमरजेंसी प्रिस्क्रिप्शन लिख के दिया हो।" घरवालों के  प्राण बचाना को तो 5 प्लेट पोहे और ढाई सौ ग्राम जलेबी बंधवा लाओ और पापा के लिए 1 पोहे एक्स्ट्रा उनको इस उम्र में 2 लगते है।"

ऐसा लग रहा है मानो कर्फ्यू नही अमरनाथ के द्वार खुल गए हो।लोग सड़क पर गाड़ी चाबी समेत खुली छोड़ कर दुकान पर लपक रहे है जैसे खास मंदिरों में लोग चप्पल जूते बेतरतीब छोड़ कर भागते है। मानो प्रसाद नही मिला तो इस तीर्थ पर आना बेकार हो जाएगा।दुकानदार ने अलग से आदमी नियुक्त किया है बताने के लिए की ये  मंदिर का पार्किंग नही है आने जाने वाली सड़क है।

कुछ तो अपने बच्चो को भी साथ लेकर आये है जिससे बच्चे सीख सके कि पोहे जलेबी की भक्ति आसान नही है।अंदर से तड़प होनी चाहिए,मुह में पानी आने के बावजूद हाथ आने तक संयम होना चाहिए।और जिनको मिल गया है उनकी प्लेट पर लालच न जगे।और इतना विश्वास होना चाहिए कि आज तो लेकर ही जाउआ।

मुझे तो लगता है गीत "इतनी शक्ति हमे दे न दाता" इंदोरियो के लिए ही लिखा गया था मैं फिर दावे से कह सकता हु की वायरस क्या प्रलय भी आ जाये तब भी एक इंदौरी को पोहे जलेबी की आसक्ति से जुदा नही कर सकता।पोहा जलेबी इंदौर का धर्म है और इंदौरी वो धर्मराज है जो स्वर्गलोक में सदेह साथ मे पोहा जलेबी लेकर जाने की कामना रखता है।

साभार भाई उल्हास के फोन कॉल से जो अन्नपूर्णा स्वीट से दर्शन प्रसादी प्राप्त कर घर लौटा है।और अभी घर की चौखट पर उसका स्वागत हो रहा है।उसने प्रसाद के कुछ फोटो भी भेजे है।

उज्ज्वल जोशी की कलम से

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