व्यंग्य--ऑनलाइन स्कूल
काश मेरे बचपन मे ऑनलाइन स्कूल का कांसेप्ट होता तो मैं अपना बचपन ज्यादा एन्जॉय कर पाता।न रात को बस्ता पैक करने का टेंशन।कपड़ो पर इस्री का बोझ,न जूतों पर पॉलिश की नसीहत ।होमवर्क न होने पर मार खाने का डर।न सरेआम इज्जत उतरने का टेंशन।न तो पढ़ाकू बच्चो के थोबड़े देखने की कोफ्त होती ।न वीकली टेस्ट में कॉपी पर अंडे और चेहरे पर चाटो के निशान होते।
पूरा सिस्टम ट्रांसपरेंट होता।न माँ बाप हमे ताना देते की स्कूल में क्या करते हो?न टीचर घरवालों को मुझ पर ध्यान देने की नसीहत देते।जो होता वो आमने सामने होता।टीचर क्या ज्ञान दे रहे है उस ज्ञान के छीटे मेरे घर आंगन में भी गिरते।और सही कहु तो मुझे ये समझ नही आ रहा कि जो काम घर पर बैठ कर तीन घण्टे में हो जाता है उसके लिए मैंने 6-7 घण्टे क्यो लगाए।यू भी हम क्लास रूम के सरोवर में बैठ कर भी गीले नही हुए तो ऑनलाइन कि ये धाराएं हमारा क्या कर लेती?
जब जिंदगी ने अनुभव की क्लास ले लेकर जवानी खराब करने की ठान ही ली थी, तो हमारा बचपन क्यो खराब किया गया?क्यो बोला गया कि पढ़लिख लो फिर जिंदगी आसान हो जाएगी?बाद में पता चला कि जिंदगी तो घरवालों की आसान होनी थी ।यू भी मुझे बचपन से लगता था कि ये किताबे तो कोई और लिख के गया है और इस सेकंड हेंड जानकारी को लोग ज्ञान क्यो कह रहे है?ऐसे विद्रोही विचार मुझे बचपन से आते थे।इतवार मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन रहा और आज भी है।पर सोमवार से शनिवार भी अच्छे लगते अगर ये ऑनलाइन स्कूल मेरे बचपन मे आ गयी होती।
सुबह 8 बजे का स्कूल और मेरे बेटे का पौने आठ को उठना।मुँह धोकर स्कूल का शर्ट पहन कर बैठना ,ये होता है असली गुड़ मॉर्निंग।मेडम भी खुश की अगला कम से कम मुँह धोकर बैठा है और कैमरे में फ्रेश नजर आ रहा है।नहाने का टेंशन नही क्योकि टीचर एक बार जो क्लास शुरू करती है तो पूरे बाल्टी भर ज्ञान से स्नान करवा देती है।बीच बीच मे जो समझ नही आया ,या नेटवर्क की वजह से छूट गया उसे प्रारब्ध मान लिया ,मानो वो आपके लिए लिखा ही नही गया था।अब अगर उस विषय मे नम्बर कम भी आये तो बड़ी आसानी से अम्बानी या एयरटेल पर ढोला जा सकता है।
सच मे मुझे अपने बच्चे की ऑनलाइन क्लास ने भावविभोर कर दिया।मुझे लगा कि मेरा बेटा तो बचपन जी पा रहा है।जा बेटा जी ले अपनी जिंदगी।आगे बड़े होने पर तो असली जिंदगी यू भी कठिन परीक्षा लेने ही वाली है।जो सीखना समझना है वो वैसे भी जिंदगी अच्छे से सीखा ही देगी।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
नोट-ये एक व्यंग्य लेख है।अन्यथा न ले।स्कूल टीचर पेरेंट सब चिंतित है।थोड़ा हँसने से चिंता कम हो जाएगी।वैसे भी कोरोना अपने आप मे आउट ऑफ सिलेबस है औऱ जिंदगी मौत की स्कूल तो लगी ही हुई है।
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