व्यंग्य-मास्क का महिमामंडन
अभी परसो की ही बात है ,मेरे एक दूर के रिश्तेदार अपनी पत्नी के साथ बाइक पर जा रहे थे।मै मेरी पत्नी भी स्कूटर पर थे और हम चारो ने चेहरे पर मास्क पहना हुआ था।हमने आपस मे एक दूसरे को भले ही कनखियों से देख लिया था।पर मास्क होने का बहाना बना कर न पहचानने का जो अभिनय चल रहा था उससे ये बात तो जाहिर हो गयी कि परिचित व्यक्ति से मिलने का मन न हो तो मास्क कितने काम की चीज है।
सोशल बिहेवियर के मनोविज्ञान को समझने के लिए बाहरी मास्क का महत्व बताना मात्र एक उदाहरण है ।पर सच कहु तो इंसान वर्तमान से पहले भी चिरकाल से मास्क का उपयोग करता रहा है।ये मास्क ,छद्म आवरण का वो मुखौटा है जिसे पहन कर इंसान अपने आप को छुपाता है,ढांकता है।जो होता है वो बताता नही और जो जताता है वो असल मे होता नही है।
मास्क दिखावे का पहन कर खुद को श्रेष्ठ और दूसरों को पानी मे देखता।चापलूसी का मास्क पहन कर अपने स्वार्थ को सुरक्षित करता।अपनेपन और प्रेम का मास्क पहन कर जीवन भर लोगो को भ्रमित करता।प्रसन्नता का मास्क पहन कर दुसरो की सफलता पर ईर्ष्या करता।बनावटी व्यवहार का मास्क पहन कर अपने लालच को साधता हुआ वो मान लेता है की वो प्रगति कर रहा है।और भौतिक सुख सुविधाएं जुटा कर जीवन भर इस बात पर खुश होता है कि वो जिंदगी जीत गया।
कोरोना बाहरी वायरस है और मुँह पर कपड़े का टुकडा पहन के कोई शायद बच भी जाए।साल दो साल धरती पर रह कर ये वायरस चला भी जाये।पर जो मानसिक विद्रूपता के बड़े बड़े वायरस हमने अंदर पाल रखे है उनका खत्म होना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि उसे तो बढ़े जतन से सहेज सम्भाल कर रखा है ,बनावटी मास्क के आवरण में।इस तरह सहेजा हुआ है की कही वो गलती से बाहर न आ जाये।अंदर से सबको इस वायरस के होने की खबर है।पर इलाज के झंझट में कोई नही उलझना चाहता।
जब तक ये मास्क लगा है तब तक जीवन का ये खेल जारी रहेगा।अनंत तक और अगले कई जन्मों तक।क्योकि मास्क अब हमारे जिंदगी का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
उज्ज्वल जोशी की कलम से
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